श्रीमद भगवत गीता के माध्यम से परीक्षा पूर्व तनाव प्रबंधन कार्यक्रम का आयोजन
12-Dec- 2018
दिनांक 11.12.2018
प्रेस विज्ञप्ति
श्रीमद भगवत गीता के माध्यम से परीक्षा पूर्व तनाव प्रबंधन कार्यक्रम का आयोजन

दिनांक 11/12/2018, ब्रम्हलीन परमहंस संत हिरदाराम साहिबजी की असीम अनुकंपा से शहीद हेमू कालानी एज्युकेषनल सोसायटी द्वारा संचालित विद्यालय मिठी गोबिन्दराम पब्लिक स्कूल एवं नवनिध हासोमल लखानी पब्लिक स्कूल में प्रेरणा स्त्रोत परम श्रद्धेय सिद्ध भाऊजी के पावन सानिध्य में कक्षा नवमीं से बारहवीं तक के विद्यार्थियों हेतु परीक्षा पूर्व तनाव दूर करने एवं परीक्षा में उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरक सत्र का आयोजन संत हिरदाराम सभागार में किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देष्य ‘‘महाभारत के अंश श्रीमद भगवत गीता में दिए गए श्लोकों के माध्यम से तनावमुक्ति के गूढ़ एवं सरलतम उपायों पर छात्रों का ध्यान केन्द्रित करना रहा।’’
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती, माँ भारती एवं ब्रह्यलीन संत हिरदाराम साहिब जी के चित्रों पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से परम श्रद्धेय सिद्ध भाऊजी (संस्था अध्यक्ष), श्री हीरो ज्ञानचंदानी (संस्था उपाध्यक्ष),श्री ए.सी.साधवानी (संस्था सचिव), श्री मनोहर वासवानी (संस्था सदस्य), श्रीमती चरनजीत कौन (प्राचार्या, संत हिरदाराम कन्या महाविद्यालय), डाॅ. अजयकांत शर्मा, प्राचार्य एवं उपप्राचार्या, श्रीमती रीटा गुरवानी (मिठी गोबिन्दराम पब्लिक स्कूल), शिक्षकगण एवं छात्रगण उपस्थित रहे।
संस्थान के प्रेरणापुंज, ज्ञानपंुज, कर्मयोगी, परम श्रद्धेय सिद्ध भाऊजी का अभिमत है कि अध्यात्म जीवन को गति विकास एवं दायित्व बोध के लिए परिपक्व बनाता है विद्यार्थी जीवन ने छात्रों को अनिवार्य रूप से अध्ययन के साथ अध्यात्म तत्व को भी व्यवहारिक जीवन में आत्मसात करना चाहिए। अध्यात्म स्वयं को स्वविवेकी और सतमार्गी बनाता है। श्री कृष्ण के द्वारा भगवत गीता में दिया गया संदेश को जानकर हमें आत्म तत्व को अपनाना चाहिए, जिससे हम भारत माता के सच्चे सपूत बनकर राष्ट्र उन्नति में सहायक बन सकें।
इसी श्रृंखला में सुश्री जाहनवी पांड्या ने अपने उद्बोधन मंे कहा कि श्रीमदभगवत गीता हमें आत्म चिंतन मनन स्व नियत्रंण तथा सार्थक व्यवहार के लिए अभिप्रेरित करती है। उन्होंने बताया कि गीता वास्तव में महाभारत युद्ध की उत्पत्ति है। गीता के अनुसार महाभारत युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण के अतिरिक्त सभी पात्र तनावग्रसित थे। श्रीमदभगवत गीता में तनावमुक्त रहने के लिए छिपे सूत्रों को आत्सात करके मानव मस्तिष्क को तनावमुक्त एवं आनंदित किया जा सकता है। परीक्षापूर्व तनाव अधिकांश रूप से आशातीत परिणाम नहीं दे पाते हमारे मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले 98 प्रतिशत डर झूठे होते है जो कभी सच नहीं होते । डर एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है डर के समय हमारा मस्तिष्क मन पर ही केन्द्रित हो जाता है हम उसी के बारे में सूचना प्रारंभित कर देते है अतः हम नियोजित कार्य ठीक से नहीं कर पाते हैं। परीक्षा वास्तव में समय एवं तनाव प्रबंधन का ही नाम है। अतः गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि - 
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।  
अर्थात सुख दुःख लाभ हानि जय-पराजय से परे होकर कार्य करना तथा परिणाम की चिंता न करते हुए कर्म करना ही मुख्य ध्येय होना चाहिए।
पढ़ाई क्यों करना चाहिए इस बात का ज्ञान तो सभी देती किन्तु इसकी प्रविधि कैसी होनी चाहिए? यही वास्तव में आज के चिंतन का विषय है। सक्षमता तभी सार्थक है जब आप उसका उपयोग समाज सेवा के लिए कर पायें। बलवान और सक्षम व्यक्ति जब समाज उपयोगी कार्यो से पीछे हटते है तो उनके जीवन में तनाव बढ़ते है। इस तनाव को नियंत्रित एवं कठिन विषयों को सरलतम तरीके से सीखने की सरलतम प्रविधियां बताईं जैसे - इतिहास में तिथियों (अंकांे) परिदृश्य संरचना (विजुअल) का प्रयोग करें इससे स्मरण शक्ति तीव्र होगी। पाठ के मुख्य बिन्दुओं को सूत्रात्मक रूप  में बाधें  तथा अपनी अभिरूचियों के अनुसार मन को गीत संगीत कहानी एवं विशेष संकेतों में बदल कर लिखना, अवधाराणाओं के मूल वर्णों से नवीनतम सूत्र की रचना करना अपने द्वारा बनाई गई पाठ योजना को पूर्ण करके ही विश्राम लेने की आदत स्वयं में विकसित करें। पढ़ाई के समय न केवल विद्यालय में बल्कि घर में भी सीधे बैठे ताकि मस्तिष्क एवं मन प्रशिक्षित हो सकें। इससे स्मरण शक्ति बढ़ती है। 
परीक्षा के पूर्व स्वयं को शांत रखें क्योंकि मन के विचलित होने से स्मरण शक्तिक्षीण होने से परीक्षा में श्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं हो पायेगा। आत्मबल में वृद्धि के लिए प्रेरणामयी गीत तथा सुमधुर संगीत गुनगनाएंे इससे आपकी सकारात्मकता बढ़ेगी। दुख-सुख का अनुभव करते हुए संघर्षों से घबरायें नहीं। दूसरों के प्रति सहानुभूति रखें।
गुरूजनों के प्रति सम्मान एवं श्रद्धा का भाव रखें। उनके प्रति श्रद्धा और विश्वास आपके विषय को सरलतम बना देता है। महाभारत में द्रोणाचार्य ने सभी शिष्यों को समान शिक्षा दी किन्तु एकलव्य इतिहास में इसी लिए प्रसिद्ध हुआ क्योंकि उसके मन में गुरू की मूर्ति के प्रति भी असीम श्रद्धाभाव था यही शास्वत सत्य है। 
गीता के पन्द्रहवें अध्याय में दिए गए आत्मा के विकास चक्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जन्म मरण के चक्र से ही आत्मा का विकास होता है। हमंे सतकर्मों की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए क्योंकि हमारी आत्मा संसार का रैन-बसेरा है। अंत में हमें परमात्मा में भी वीलन हो जाना है। 
भारतीय संस्कृति का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि हम भारतीय जब एक दूसरे से मिलते हैं तो नमस्कार करते हैं इसका मतलब है कि एक दूसरे की आत्मा का सम्मान करते हंै इसी बात को हमें अपने अंतर्मन में बार-बार दोहराना है। 
अपने आप को समय-समय पर प्रोत्साहित करना एवं क्षमा करना सीखें। स्वयं से प्यार करना सीखें यही तनावमुक्ति एवं सकारात्मकता का सर्वोत्तम उपाय है तथा विभिन्न प्रेरणामयी गीतों के माध्यम से छात्रों को जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण परिवर्तित करने तथा अध्ययन के प्रति अभिप्रेरित किया। 
अंत में छात्रों के प्रश्नों को प्रश्न मंच के माध्यम से हल किया गया। 
कार्यक्रमों का कुशल संचालन श्रीमती प्रमितादास द्वारा किया गया। वन्देमातरम् गीत के साथ कार्यक्रम का सार्थक समापन हुआ। 



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